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"सनातन धर्म की जय"
Mata Jagan Maa ki Jai
मिल गया भगवान का proof
माता जागण मां दरबार,उल्हासनगर.4
श्री पूज्य सतगुरु बाबा बलराम साईं
प्यारी साज संगत
हमने जो भगवान के बारे में ,आत्मा के बारे में और जीव के बारे में संतजनों के विचार सुने हैं या श्रीमद् भागवत पुराण या श्रीमद् भागवत गीता में पढ़े हैं उनके आधार पर हम ये विचार पेश कर रहे हैं ।
भगवान का proof जानने के लिए हमें यह समझना अति आवश्यक है कि हम कौन हैं ,क्या हम भगवान हैं या आत्मा है या भगवान का एक अंश है या भगवान का स्वरूप है या एक जीव है।
हमें यह भी समझना आवश्यक है कि भगवान कौन है आत्मा कौन है और दोनों में अंतर क्या है ।
भगवान एक शक्ति है , ज्योत है जैसे electricity याने power है जिसे हम देख नहीं सकते पर छूकर महसूस कर सकते हैं ।भगवान का कोई रंग रूप नहीं है इसलिए उसे "निरंकार" कहते हैं ।भगवान की जब इच्छा होती है तब वे "साकार" रूप अपना कर पृथ्वी पर आते हैं जैसे श्री राम श्री कृष्ण आदि बनकर।
अभी हमने जान लिया कि भगवान क्या है । अब हमें जानना है कि "आत्मा" क्या है । आत्मा भगवान का एक छोटा सा चिंगारी जैसा अंश है।जैसे आग में से एक चिंगारी निकलती है उसी प्रकार परमात्मा रूपी ज्योति से एक छोटी सी ज्योत निकलती है जिसे "आत्मा" कहते हैं। जैसे आग और चिंगारी में कोई फर्क नहीं होता है दोनों में जलाने के गुण same है ठीक वैसे ही भगवान और आत्मा में गुण same है याने एक जैसे हैं ।
मैं अगर पूरा apple खाऊंगा या उसका एक छोटा सा टुकड़ा याने अंश तो मुझे दोनों में से एक जैसा ही स्वाद या vitamins मिलेंगे ना कि अलग-अलग क्योंकि छोटा सा टुकड़ा उसी apple का एक हिस्सा है part है याने "अंश" है दोनों में एक ही गुण है
भगवान क्या है और आत्मा क्या है यह हमने समझ लिया अब हमें यह समझना है कि "मैं कौन हूं", कहां से आया हूं, क्यों आया हू और फिर कहां जाऊंगा ।
श्रीमद् भागवत पुराण में Manoj Publication के 2014 की edition में page no .97 पर बताया गया है जब मायापति भगवान ने एक से बहुत होने की इच्छा की, तब अनेक रूप होने के लिए भगवान ने ब्रह्मा जी को सृष्टि रचने की आज्ञा दी तब भगवान की माया से ब्रह्मा जी ने सात्विक ,राजस और तामस तीन गुण उत्पन्न किए और उन्ही तीन गुणों के द्वारा ब्रह्मा जी ने पांच तत्व : जल ,अग्नि ,पृथ्वी ,आकाश और वायु का निर्माण किया और इन पांच तत्वों से मिलकर "जीव" बनाया और उस जीव में शब्द ,स्पर्श ,रूप ,रस , गंध की पांच तन्मात्राओ के लिए पांच ज्ञानेंद्रिया और पांच कर्मेंद्रियां बनाई पांच ज्ञानेंद्रिया ये है : कान, त्वचा,नेत्र, जिव्हा और नाक ।पांच कर्मेंद्रियां ये है: वाणी ,हाथ ,पैर , गुदा और जननेद्रियां। इसके अतिरिक्त इन सभी इंद्रियों के संचालन के लिए "मन" बनाया और तब उस शरीर को सक्रिय करने के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान से वंदना की तब परमात्मा ने अपने ज्योतिर्मय रूप से अपना एक अंश उस जीव के हृदय में जीवनी शक्ति बनके याने आत्मा के रूप में उस जीव मे प्रवेश किया तब जाकर वह जीव चलने फिरने लगा ।उस जीव में सब देवताओं के वास होने के बावजूद भी वह जीव उठ चल फिर नहीं सका केवल तभी ब्रह्मा जी ने भगवान से अपनी छोटी सी ज्योत याने आत्मा डालने के लिए निवेदन किया । जिसके शक्ति पर जीव उठ ,बैठ, चल फिर सका तब जाकर वह एक पूर्ण जीव बन गया जो हम ही हैं । जीव ना तो भगवान है नाही आत्मा, नहीं भगवान का अंश और नाही एक स्वरूप है। जीव में भगवान जैसे लक्षण या गुण नहीं है बल्कि वे उल्टे हैं । आत्मा अंश या स्वरूप में भगवान जैसे गुण या लक्षण होते हैं। इसलिए आत्मा को भगवान कहते हैं। भगवान आत्मा के रूप में हमारे हृदय में बैठे हैं ,सुनते हैं ,देखते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं पर हम उनकी कुछ नहीं सुनते हैं और माया के वस आकर उसकी सुनते हैं। असल में हम भगवान के वंश है अंश नहीं क्योंकि हम भगवान का हिस्सा नहीं है बल्कि उसने हमें बनाया है याने हम भगवान की संतान है। वंश है यही कारण है हम में अपने पिता जैसे लक्षण या गुण नहीं है ।हम केवल जीव हैं ।भगवान सब कर्मों से या जन्म मरण से मुक्त है हम उसमें फंसे हुए हैं ।
गीता भी जीव का जिक्र करती है जिसमें भगवान ने कहा है कि मैं जब जन्म लेता हूं तो माया को वश में करकर जन्म लेता हूं और जीव माया के वश में आकर जन्म लेता है ।माया का असर जीव पर है भगवान पर नहीं क्योंकि वह भगवान के अधीन है ।
भगवान ने श्रीमद् भागवत गीता में यह भी कहा है कि मैं ही काम, क्रोध , लोभ ,मोह, अहंकार आदि हूं । उसने ऐसा नहीं कहा है कि मैं ही कामी ,क्रोधी आदि हूं ।वह कौन है वह जीव ही है ।
श्री रामचंद्र ,श्री कृष्ण ने भी यह शरीर पाया था लेकिन वे भगवान थे इसलिए वे शरीर याने माया के वश में नहीं आये और हम माया के वश में है क्यूं कि हम केवल जीव हैं भगवान नहीं । हम भगवान नहीं है पर हम में भगवान आत्मा के रूप में है । जब मैं खुद भगवान हूं तो मैं यह क्यों कहूंगा कि मुझ में भगवान है । हम दोनों अलग-अलग हैं इसलिए हम कहते हैं हम में भगवान है ।
अब भगवान का proof क्या है ?
भगवान का proof हम जीव ही हैं वो कैसे सुनिए ।
ब्रह्मा जी ने जब जीव बनाया तब वह जीव देवताओं याने पवन आदि के बल पर सांस ले रहा था, देख रहा था लेकिन उस जीव में उठने चलने फिरने की शक्ति नहीं थी जिसको प्रदान करने के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान से विनती की तब भगवान ने उस जीव को शक्ति देने के लिए अपनी शक्ति में से एक छोटा सा अंश आत्मा बनकर उस जीव में प्रवेश किया जिसके शक्ति के बल पर जीव चलने फिरने लगा जैसे fan में power जाता हो
भगवान ने जब पहली बार जीव बनाये तब ऊपर वाले तरीके से बनाये।
उन जीवों को जननेंद्रियां दी जजसके through जीव और जीव पैदा कर सकता है । जब वकसी ने पहले जनम में बुरे कर्म किये उसको दूसरा जनम मिला उसी जीव के मन - बाप के सांजोग करने द्वारा । यह क्रिया सदियों से चालू है ।
बच्चा याने जीव जब मां के पेट में आता है तब ब्रह्मा जी उस बच्चे की रचना करते हैं ।तब देवता भी उस बच्चे में प्रवेश करते हैं यही कारण है कि हमारी जन्मपत्री में मंगल आदी देवता होते हैं । चार महीने तक बच्चा सांस तो लेता है पर हिलता फिरता नहीं है, जब पांचवे महीने में परमात्मा आत्मा के रूप में उस बच्चे में प्रवेश करते हैं तब वह बच्चा चलता फिरता है मां के पेट में जिसे हम हाथ लगाकर महसूस कर सकते हैं बिलकुल वैसे जैसे हर् power को देख नहीं सकते बल्ल्क छू कर महसूस करते हैं जिसकी शक्ति पर fan चलता है।
यह चलना फिरना हम में या बच्चे में आत्मा याने भगवान के प्रवेश करने कारण हैं । इसलिए हम नहीं चलते असल में भगवान चलता है । अगर आप कहें कि नहीं मैं चलता हूँ या चलाता हूँ तो आप ये बताये की क्या आँखों की पलकें आप झपकाते या दिल की धड़कन को आप चलाते हैं या ये सब अपने आप होता है । अगर अपने आप होता है तो वो कौन चलाता है ।जो शक्ति चलाती है वही भगवान है जो मेरे अन्दर है। मेरा हाथ का काँपना या काम न करना वह भी उस शक्ति के कारण ही है ना के मेरी मर्ज़ी के कारण है न के मेरी मर्ज़ी पर इसलिए उस शक्ति याने भगवान का proof ही हैं ।
हम जीव कहाँ से आये हैं : भगवान के घर से आये हैं हम यहाँ क्यों आये है: हम पिछले जनम के कर्मो का फल भोगने आये है और साथ साथ नए कर्म करने आये है। हम कहाँ जायेंगे उसी भगवन के घर हिसाब देने जायेंगे। हमने अगर इस जनम में केवल अच्छे करम धरम के अनुसार किये है और थोड़ा भी नाम जपा है तो हम वैकुण्ठ जायेंगे नहीं तो कर्मो के हिसाब से वापस यहाँ आकर फिर भोगेंगे फिर नए कर करेंगे जो सिलसिला सदियों से चालू है। केवल धरम और नाम ही मुक्ति दिलाते है। सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ जो है वो है धरम। हम भगवान का स्वरुप नहीं है पर अच्छे कर्म करके धरम पर चलके और नाम जप करके हम भगवन का स्वरुप बन सकते है। इसलिए भूलके भी कोई भूरा कर्म मत करो नहीं तो इस चक्र से नहीं चोटेँगे। धरम ही इंसान को pure बनता है उसे बुरा कर्म करने से रोकता है।
केवल धरम यानी "सत्य की रह पे चलना अपनी duty कर्त्तव्य का पालन करना ", अच्छे करम, नाम, पूजा, आदि ही मोक्ष दिलाते है। भगवन ने अनेक आत्माएं बनाकर कई रूप लिए है न की जीव बनकर इसलिए जीव भगवन नहीं है
हरिहर
बलराम
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